जनम से सभी शूद्र होते हैं। कोई भी ब्राह्मण क्षत्री या वैश्य नहीं होता। उसके बाद संस्कार से द्विज वेदों के अध्ययन से विप्र और तपस्या या विद्या से ब्रम्ह की जानकारी हो जाने पर ब्यक्ति ब्राह्मण बनता है अर्थात जन्म से कोई ब्राह्मण या अन्य वर्ण नहीं होता बल्कि कर्म के अनुसार वर्ण बनता है राम चरित मानस में गोस्वामी जी ने लिखा है ----कर्म प्रधान विश्व रची राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा। कर्म के अनुसार ही पुरे संसार की रचना हुई है। इस लिए जो कोई भी जैसा कर्म करेगा उसी के अनुसार उसे फल भी मिलेगा। संसार में सबकुछ होने के बाबजूद भी सभी को सबकुछ नहीं मिलता बल्कि कर्म के अनुसार ही प्राप्ति होती है।अच्छे कर्म से ही ब्यक्ति महान बनता है और बुरे कर्मो से राक्षस।
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