Vedon ka Rahsya

Pado kam samjho jyada

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

वर्ण व्यवस्था

 वर्ण व्यवस्था

वर्ण व्यवस्था समाज को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने का एक वैदिक विधान है जो कि व्यक्ति के स्व भाविक गुणों के आधार पर निर्धारित है । अर्थात व्यक्ति के अंदर जैसा स्वाभाविक गुण होता है उसी के अनुसार उसके वर्ण का निर्धारण होता है । संसार में जितने भी बुद्धिजीवी एवं उच्च शिक्षित लोग हैं उन सबको ब्राह्मण वर्ण में रखा गया है । शारीरिक एवं मानसिक रूप से अत्यंत बलवान व्यक्ति क्षत्रिय कहलाता है । आयात और निर्यात आदि व्यापार कर्म में निपुण लोगों को वैश्य वर्णन कहा जाता है । उपरोक्त तीनों गुणों से रहित और अशिक्षित मजदूरी करने वाले श्रमिकों को शुद्र वर्ण के अंदर रखा गया है । अर्थात संसार में जितने भी उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टर वकील इंजीनियर आईपीएस ऑफीसर्स आदि बुद्धिजीवी लोग हैं जिनकी बुद्धि की सहायता से देश को चलाया जाता है उन सबको ब्राह्मण कहा जाता है । चाहे उनका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो । सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने वाले सभी सत्ताधारी लोगों, पुलिस वालों एवं सुरक्षा कर्मचारियों को क्षत्रिय वर्णन के अंदर माना जाता है । और अशिक्षित मजदूरी करने वाले सभी लोग शुद्र कहलाते हैं । अतः शुद्र कोई जात नहीं है बल्कि श्रमिकों एवं अज्ञानी लोगों को ही शुद्र कहा जाता है । वर्ण व्यवस्था की यही परिभाषा श्रीमद् भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवत महापुराण आदि धर्म ग्रंथो में भी दी गई है ।

रविवार, 4 फ़रवरी 2024

सति मोह प्रसंग

 सती मोह प्रसंग

एक बार त्रेता युग में भोले बाबा माता सती के साथ अगस्त ऋषि के पास गए संपूर्ण जगत के स्वामी जानकर अगस्त मुनि ने उनका बहुत ही आदर सत्कार किया और शास्त्र विधि से उनका पूजन किया उसके बाद मुनि ने भगवान शंकर को संपूर्ण राम कथा सुनाई जिसे सुनकर भगवान शंकर को परम आनंद की प्राप्ति हुई फिर भोले बाबा ने मुनि को भक्ति का रहस्य विस्तार से बताया कि भक्ति क्या होती है कैसे की जाती है

      इस प्रकार भगवान का गुणगान करते हुए महादेव जी कुछ दिनों तक मुनि के पास रहने के बाद मुनी से वीदा लेकर कैलाश की ओर चल पड़े उन्ही दिनों भगवान ने दशरथ जी के घर में उनके पुत्र के रूप में राम अवतार ले चुके थे राम जी का बनवास हो चुका था और वे दंडक वन में विचरण कर रहे थे । भगवान शंकर बनवासी रूप का दर्शन करना चाह रहे थे परंतु वे अपने मन में विचार करते हैं कि प्रभु ने तो गुप्त रूप से अवतार लिया है और मेरे जान पहचान करने से यह सारा भेद खुल जाएगा और लीला में विघ्न उत्पन्न हो सकता है इसलिए भगवान शंकर के मन में बड़ी खलबली मच गई क्योंकि मन में गुप्त रहस्य खुलने का डर था और दर्शन के लिए आंखें तरस रही थी भगवान इसी दुविधा में फंसे थे परंतु सती जी इस रहस्य से अनजान थीं ।

     भक्त भगवान का दर्शन करना चाहे और भगवान दर्शन ना दें ऐसा कभी हो ही नहीं सकता अचानक घटना घटती है और सामने राम जी अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी के साथ दिखाई देते हैं उस वक्त भगवान साधारण बिरही मनुष्य के समान लीला कर रहे हैं अपनी पत्नी सीता जी के बिरह में व्याकुल और बेचैन होकर जंगल में भटक रहे हैं भोले बाबा इस रहस्य को खोलते हुए कहते हैं कि जिस भगवान के पास कभी भी योग या वियोग होता ही नहीं क्योंकि भगवान तो परमानंद है उनके दुख के विषय में सोचना भी पाप है आज लीला बस उसी भगवान को पत्नी वियोग में दुखी देख रहा हूं यही विचित्रता है क्या विचित्र लीला है भगवान की इसलिए गोस्वामी जी ने लिखा 

अती विचित्र रघुपति चरित्त जानहीं परम सुजान ।

जो मतिमंद विमोह बस, हृदय धारहिं कछु आन।। भगवान श्री राम का चरित्र बड़ा ही विचित्र है उसको पहुंचे हुए भक्त और ज्ञानी लोग ही समझ सकते हैं साधारण लोगों की समझ से परे की बात है और जो मंदबुद्धि हैं नास्तिक हैं वे अपनी अज्ञानता के कारण इस गुप्त लीला को कुछ और ही समझ बैठते हैं और अपनी बीमारी लोगों में फैलाते हुए कहते हैं कि राम भगवान नहीं है वह तो एक साधारण राजा है भक्तों भगवान के विषय में शंका करना या कुतर्क करना अति विनाशकारी होता है इसी बात को बताने के लिए सती जी के द्वारा कुतर्क करने की लीला आप आगे देखेंगे

        जब भगवान शिव ने श्री राम जी को दंडक वन में विलाप करते हुए देखा तो उन्हें दूर से ही

जय सच्चिदानंद जग पावन ।

अस कही चलेउ मनोज नासावन ।। 

हे संसार को पवित्र करने वाले सत् चित आनंद स्वरूप हे परमानंद सच्चिदानंद आपकी जय हो जय हो प्रभु । इस प्रकार सच्चिदानंद कहकर उन्हें दूर से ही प्रणाम किया लेकिन उनके पास नहीं गए ऐसा करने से पास जाकर जान पहचान करने से लीला में वाधा उत्पन्न हो सकती थी ।

      इस प्रकार अपने मन में विचार करते हुए भगवान शंकर माता सती जी के साथ कैलाश की ओर चले जा रहे हैं उनका शरीर आनंद से बार-बार पुलकित हो रहा है रोम रोम में रोमांच हो रहा है जब सती जी ने शिवजी की ऐसी दशा देखी तो उनके मन में बड़ा भारी संदेह उत्पन्न हो गया यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि सती जी तो आदिशक्ति हैं जग जननी है सृष्टि स्थिति व विनाश के कारण है भगवान की अहलादिनी शक्ति है वही दुर्गा काली पार्वती व सीता हैं भला उन्हें भगवान के विषय में शंका कैसे हो सकती है वह तो साधारण स्त्रियों को ज्ञान देने के लिए लीला कर रही हैं इसीलिए इस प्रसंग के प्रारंभ में ही गोस्वामी जी ने बता दिया है कि सती जी जग जननी है माता पार्वती अर्थात भवानी है ।

संग सती जग जननि भवानी ।

पूजे ऋषि अखिलेश्वर जानी ।।

  पहले ही बताया जा चुका है कि भगवान की लीला बहुत ही विचित्र है उसे हर कोई नहीं समझ सकता इसी बात को सिद्ध करने के लिए सती जी यह लीला कर रही है ।

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

लक्ष्मी पूजन विधि हिंदी में

दोस्तों अलग-अलग कामनाओं की पूर्ति के लिए अलग-अलग देवी-देवताओं का पूजन करने का विधान है । धन प्राप्ति व अन्य सुख समृद्धि प्राप्ति हेतु शास्त्रों में महालक्ष्मी पूजन का विधान बताया गया है । और हर पूजन में एक शुभ मुहूर्त की जरूरत होती है । महालक्ष्मी पूजन के लिए सबसे उत्तम मुहुर्त दीपावली की रात को माना गया है। 
धर्म ग्रंथों में लक्ष्मी पूजन का विस्तार से वर्णन किया गया है । परंतु इस विधान को केवल बड़े-बड़े विद्वान् कर्मकांडी ही कर सकते हैं । यह साधारण मनुष्य के वस की बात नहीं है । अतः मैंने बहुत ही सरल भाषा व संक्षेप में इसे बताने का प्रयत्न किया है । जिससे साधारण व्यक्ति भी लाभ प्राप्त कर सकता है । मुझे उम्मीद है कि यह पोस्ट आपको बेहद पसंद आएगा और आप लाभांवित भी होंगे । 
 दोस्तों ! दीवाली की रात को गणेश , लक्ष्मी , कुबेर महाकाली , महासरस्वती , देहली विनायक तुला व दीपमाला की पूजा की जाती है । दिवाली की रात यंत्र निर्माण व मंत्रों की सिद्धि के लिए बहुत ही प्रशस्त मुहूर्त माना गया है । पुराणों के अनुसार आज ही के दिन समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था अतः इस रात को भगवती लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए उनकी पूजा की जाती है । दोस्तों किसी भी पूजा विधि में तीन प्रकार के मंत्रों का उच्चारण किया जाता है । सर्वोत्तम विधि में वेद मंत्रों का प्रयोग होता है परंतु जो व्यक्ति वेद मंत्रों का शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते हैं उनके लिए पौराणिक मंत्रों का आदेश दिया गया है । लेकिन जो लोग संस्कृत भाषा नहीं जानते और पुराणों के मंत्रों का भी उच्चारण नहीं कर सकते तो ऐसे लोगों के लिए केवल नाम मंत्र से ही पूजन करने का विधान बताया गया है । अर्थात् जिस देवी या देवता का पूजन आप कर रहे हैं उनका नाम मात्र का उच्चारण करते हुए पूजन कर सकते हैं । यह विधि भी शास्त्रीय विधान में शामिल है कोई मनगढ़ंत नहीं है । जैसे आप लक्ष्मी पूजन कर रहे हैं तो " ओम श्री महा लक्षम्यै नमः " बोलते जाएं और विधि करते जाएं । तो आइए प्रारंभ करते हैं महालक्ष्मी पूजन -
सर्वप्रथम शुद्ध पीले कपड़े पहन कर पीले आसन पर पूरव या उत्तर की ओर मुंह करके बैठ जाएं ।
पूजन की सभी सामग्री अपने आसपास रख लें । सामग्री की लिस्ट भी वीडियो के बीच में ही दे रखी है । फिर पीतल के लोटे में गंगाजल मिश्रित जल भरकर रख लें । अपने सामने चौकी पर पिला आसन बिछाकर उस पर गणेश और लक्ष्मी जी की मूर्ति या फोटो रख लें । साथ में श्री यंत्र , लक्ष्मी यंत्र , कुबेर यंत्र ,सोना , चांदी के आभूषण आदि भी रख ले । लक्ष्मी यंत्र सोने पर चांदी पर या तांबे पर भी बनाए जाते हैं । चावल के ऊपर गाय के घी का दीपक जलाकर पूर्व मुख या उत्तर मुख रख दें । एक थाली या प्लेट में सिंदूर से स्वास्तिक बनाकर सामने रख लें । 
अब सर्वप्रथम चावल और फूल हाथ में लेकर " गंगा मैया को प्रणाम , यमुना मैया को प्रणाम , सरस्वती मैया को प्रणाम और वरुण देव को प्रणाम " ऐसा बोलकर चावल और फूल लौटे के जल में डाल दें ।लोटे को मौली यानी रक्षा सूत्र बांध कर तिलक लगा दे । अब उस जल से "हरि ओम , नमो भगवते वासुदेवाय " इस प्रकार भगवान का नाम लेकर आम का पत्ता या फूल से अपने ऊपर जल छिड़कें । 
तीन बार आचमन करें यानी उस जल का पान करें । 
अपने मस्तक पर केसर चंदन आदि का तिलक लगा ले । 
स्वस्ति वाचन -
फिर हाथ में पुष्प और अक्षत लेकर अपने गुरु भगवान व माता-पिता का ध्यान करते हुए चावल व फूल स्वास्तिक स्वरूप गणेश जी पर चढ़ा दें । 
संकल्प
फिर अर्घे में या हाथ में पुष्प अक्षत चंदन और जल लेकर संकल्प करें -
आज कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अमावस्या की रात को दीपावली के शुभ अवसर पर सभी अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए , अखंड लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए व मां लक्ष्मी जी की प्रसन्नता के लिए
आमुख गोत्र ( यहां अपने गोत्र का उच्चारण करें और अपने नाम का उच्चारण करें ) मैं यथा शक्ति गणपति , महालक्ष्मी , कुबेर , महाकाली , महासरस्वती , देहली व दीपावली पूजन करूंगा । ऐसा बोलकर जल एक कटोरी में गिरा दें । 
दोस्तों यह विधि मैं केवल सर्वसाधारण लोगों के लिए बता रहा हूं अतः विद्वत जन क्षमा करेंगे ।
अगर श्रद्धालु जन मंत्र उच्चारण पूर्वक पूरी विधि जानना चाहते हैं तो कमेंट बॉक्स में हमें कमेंट करके लिखें मैं ।
इसके बाद पूजन की प्रक्रिया प्रारंभ करें । 
ज्योति पूजन
सर्वप्रथम " दीप ज्योत्यै नमः " का उच्चारण करते हुए ज्योति को फूल अक्षत चंदन और जल अर्पण करें , तिलक लगाएं और धूपबत्ती दिखाएं । यह ज्योति की संक्षेप पूजन है । और आगे सभी संक्षेप पूजन में यही विधि अपनाएं ।
गणेश पूजन
फिर " गणेशाय नमः " बोलते हुए गणेश जी के ऊपर जल छिड़के , मौली चढ़ाएं , तिलक लगाएं , चावल फूल चढ़ाएं । धूप अगरबत्ती दिखाएं , नैवेद्य यानी मिठाई चढ़ाएं , फल और दक्षिणा चढ़ाएं और अंत में प्रणाम करें यह गणेश पूजन है ।
कलश पूजन
अब एक दूसरे लोटे या घड़े में गंगा जल व शुद्ध जल डालकर उसमें एक सुपारी , एक सिक्का , चंदन व दूर्वा डाल कर उसमें आम के पत्तों की गुच्ची रखकर उस पर छोटी प्लेट में चावल भर कर रख दें । पानी वाला नारियल लाल कपड़े में लपेटकर उस के ऊपर रख दें । " कलश कुंम्भाय नमः , वरुणाय नमः " बोलते हुए गणेश पूजन की तरह सभी सामग्री कलश के ऊपर चढ़ाएं । 
महालक्ष्मी पूजन
" ओम् श्री महालक्षम्यै नमः " संपूर्ण पूजा में इसी मंत्र का प्रयोग करना चाहिए । इसी मंत्र से सभी सामग्री चढ़ाना चाहिए । सर्वप्रथम हाथ में पुष्प अक्षत लेकर भगवती लक्ष्मी का आवाहन करना चाहिए जैसे ओम् श्री महालक्षम्यै नमः माता लक्ष्मी जी मैं आपका आवाहन करता हूं । ऐसा बोलकर या मन में सोच कर चावल फूल मां लक्ष्मी के चरणों में चढ़ा दे । पुणह " ओम् श्री महालक्षम्यै नमः " इस मंत्र का उच्चारण करते हुए आसन के लिए चावल फूल चढ़ाएं, स्नान के लिए जल का छींटा दें , फिर पंचामृत स्नान के लिए पंचामृत का छींटा दें , दुबारा फिर जल से स्नान कराएं , वस्त्र के लिए मौली चढ़ाएं , तिलक लगाएं , पुष्प अक्षत , फूल की माला , सिंदूर और दूर्वा अर्पण करें , धूप और दीपक दिखाएं , नैवेद्य अर्थात मिष्ठान व विविध पकवानों का भोग लगाएं , मुख शुद्धि के लिए जल का छींटा दें । इसके बाद फल , लोंग इलाइची पान पत्ता या मीठा पान और दक्षिणा अर्पण करें , नमस्कार करें और कपूर की आरती दिखाएं ।
देहली विनायक पूजन
घर मकान दुकान या ऑफिस आदि के दरवाजे के पास बाहर की ओर दीवार पर सिंदूर से स्वस्तिक बना दें शुभ और लाभ लिख दें और फिर चावल और फूल चढ़ाकर तिलक लगाकर दीपक दिखाकर उनकी पूजा करें ।
महाकाली पूजन ( कलम और दवात के रूप में )
एक स्याही से भरी हुई दावत लेकर उस पर सिंदूर से स्वास्तिक बनाकर उस पर मौली लपेटकर लक्ष्मी जी के आगे चावल की ढेर पर स्थापित करें ।" महाकाल्यै नमः " इस मंत्र का उच्चारण करते हुए चावल फूल तिलक और दीपक दिखाकर संक्षेप पूजन करें । इसी तरह एक स्याही वाली नई कलम लेकर उस पर मौली लपेटकर उसकी भी पूजन कर ले ।
महा सरस्वती पूजन ( खाता बही के रूप में) 
इसी तरह खाता बही ,तुला अर्थात तकड़ी या कंडा आदि और तिजोरी यानी गले की भी पूजा करनी चाहिए । इन पर स्वास्तिक का चिन्ह जरूर बनाना चाहिए । 
कुबेर पूजन
मां लक्ष्मी के आगे कुबेर यंत्र को स्थापित करके " ओम कुबेराय नमः " इस मंत्र से पहले की तरह पूजन करें । कुबेर पूजन में लक्ष्मी पूजन वाली सभी सामग्री चढ़ाना चाहिए ।
दीपावली पूजन
एक बर्तन में 5 7 9 11 21 या श्रद्धा के अनुसार तेल के दीपक जलाकर लक्ष्मी जी के सामने पंक्ति वध रखकर संक्षेप विधि से " ओम दीपावल्यै नमः " इस मंत्र से पूजन करें । जनसाधारण चाहे तो यह संपूर्ण पूजन करें अथवा अपनी इच्छा अनुसार गणेश , लक्ष्मी , कुबेर , दीपक और देहली पूजन ही करें। परंतु व्यवसायिक लोगों को संपूर्ण पूजन ही करना चाहिए । हो सके तो किसी विद्वान कर्मकांडी से ही यह संपूर्ण पूजन करवाना चाहिए ।
आरती
5 या 7 बत्तियों वाली ज्योति प्रचंड करके सर्वप्रथम उसके चारों ओर जल का घेरा लगाना चाहिए । फिर बाएं हाथ से गरुड़ घंटा बजाते हुए सर्वप्रथम चार बार मां के चरणों में दो बार नाभि देश में एक बार मुख्य मंडल पर और 7 बार समस्त अंगों में आरती घुमाना चाहिए । इसके बाद शंख में जल भरकर मूर्ति की चारों और घुमा कर अपने ऊपर और अन्य भक्तों के ऊपर उस जल को छिड़कना , आरती लेना , साष्टांग दंडवत करना प्रसाद वितरण करना और अंत में विसर्जन करना चाहिए ‌।

बुधवार, 6 जून 2018

वेदों का महत्व

वेद का अर्थ होता है ज्ञान अथवा जानकारी । इसकी उत्पत्ति संस्कृत के विद् धातु से हुई है ।वेद कोई साधारण पुस्तक नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का सबसे प्राचीनतम दस्तावेज है । यह किसी जाति धर्म या संप्रदाय से संबंधित नहीं है बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए अत्यंत ही उपयोगी और लाभदायक है । उसे और अधिक सरल भाषा में अगर कहें तो वेद मनुष्य जीवन का मूल संविधान है जिसके अभाव में मानव, मानव कहलाने का अधिकारी भी नहीं रह जाता । वेद के आधार पर ही दुनिया की अन्य धार्मिक मान्यताओं और विचारधाराओं का आरंभ और विकास हुआ है क्योंकि दुनिया का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद है जिसे ईश्वर की वाणी भी समझा जाता है । वेद का ज्ञान किसी जाति या संप्रदाय विशेष के लिए नहीं ,  बल्कि संपूर्ण प्राणी मात्र के लिए है । वेदों में ज्योतिष, गणित, विज्ञान, धर्म, औषधि, प्रकृति ,और खगोल के अलावा भी सभी विषयों का भंडार भरा पड़ा है। वेद मानवता की रीढ़ की हड्डी माने जाते हैं । इसके अभाव में सभ्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इतिहासकारों के अनुसार वेदों की रचना लगभग आज से 35०० वर्ष पूर्व माना जाता है । शुरुआत में केवल एक ही वेद ऋग्वेद था । अध्ययन में सरलता की दृष्टि से वेदव्यास जी ने उसे चार भागों में बांटा और अपने चार शिष्यों को पढ़ाया । ऋग्वेद , यजुर्वेद ,सामवेद ,  और अथर्ववेद ।
        वेदों के सार को समझने के लिए शिक्षा, (नाक )कल्प ,( हाथ ) व्याकरण , ( मुख )निरुक्त , ( कान )  छंद (  पैर )और ज्योतिष ( आंख ) इन वेदांगों के सहित ही वेद का अध्ययन परम आवश्यक है । वेद ना सिर्फ भारत का बल्कि विश्व का प्राचीनतम वांग्मय है । यह विश्व के सभी धर्मों का मूल है । इसका मतलब है संसार का कोई भी धर्म वेद से अलग नहीं है । इसीलिए कहा गया है ( वेदोsखिलो धर्म मूलम् ) वेद की समस्त शिक्षाएं सार्वभौम हैं ना कि किसी जाति या संप्रदाय विशेष के लिए । यह किसी भी इन्सान को हिंदू ,सिख ,इसाई ,बौद्ध ,जैन या मुसलमान बनने की आज्ञा नहीं देता बल्कि वेद का कहना है (मनुर्भव )अर्थात् मनुष्य बनो । फिर भी बहुत दुख की बात है कि आज के तथाकथित धर्म गुरु वेदों व अन्य धर्म शास्त्रों का कुप्रचार करने में ही अपनी विद्वता समझने लगे हैं । ऐसे धूर्त , देश द्रोही ,व बिकाऊ लोग मनुवाद व ब्राह्मणवाद आदि अनेकों वादों को चलाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं , देश में महान विवाद को जन्म देने में लगे हुए । हलाकि ये लोग वेद  ज्ञान से बिल्कुल सून्य होते हैैं कभी भी उन्होंने वेदों को पढ़ा लिखा नहीं है । वेदों का मौलिक ज्ञान नहीं होने से ही आज का इंसान जगह-जगह भटक रहा है । कभी इस कैंप में तो कभी उस कैंप में । आज जगह-जगह कैंप लगाकर  होलसेल में नाम दान दिया जा रहा है। इसी बहाने रामपाल , आसाराम , राधे मां ,निर्मल बाबा ,और राम रहीम जैसे पाखंडी संत बरसाती कीड़े मकोड़ों की तरह भर गए हैं और ये भोली भाली जनता को लूटने में लगे हुए हैं। इसका मूल कारण है ज्ञान का अभाव । ये राक्षस लोगों ने अपने आप को भगवान घोषित कर रखा है जबकि सभी जानते हैं कि भगवान ईश्वर या परमात्मा केवल एक है उसके नाम और रूप अनेक हो सकते हैं । वेद कहता है ( एकं सद्विप्रा बहुधा वदंति ) अर्थात् एक ही परमात्मा को विद्वान लोग अनेकों नामों से जानते हैं , अनेक रूपों में उसकी पूजा अर्चना करते हैं ।
      भगवान का स्वरूप कैसा है , इसे बताते हुए वेद कहता है कि विश्व के असंख्य प्राणियों के असंख्य सिर , आंखें और पैर उस परमपिता परमेश्वर का ही सिर , आखें तथा, पैर है । वह ईश्वर संपूर्ण ब्रहमांड को बाहर और भीतर सब ओर से घेर कर सर्वत्र व्याप्त है ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः .......... 

रविवार, 3 जून 2018

दुःखी जीवन कारण और निदान

आज का युग विज्ञान का युग है । शिक्षा का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है । अधिकतर लोग शिक्षित हो चुके हैं । आज बड़े बड़े डॉक्टर , वकील , लेखक , कथावाचक एवं ब्रह्म ज्ञानी लोग उत्पन्न हो चुके हैं ,  अनेकों प्रकार की दवाइयां बन चुकी है,  हर प्रकार के सुख साधन उपलब्ध हैं ,प्रतिदिन हजारों कथाएं हो रही है परंतु चिंता का विषय यह है कि इतना कुछ होने के बावजूद भी इंसान का जीवन बद से बदतर होता जा रहा है आखिर क्यों ? इस पर हमें गहराई से चिंतन करना होगा । इसका सही उत्तर है
कलिमल   ग्रसे   धर्म सब , लुप्त      भए   सदग्रंथ ।
 दंभिन्ह निज मति कल्पि करि, प्रकट किए बहु पंथ।।
 भ‌ए लोग सब मोहबस , लोभ     ग्रसे   शुभ  कर्म ।
सुनूं हरिजान ज्ञान निधि , कहउ   कछुक कली धर्म।।
बरन धर्म नहीं आश्रम चारी । श्रुति विरोध रत सब नर नारी ।।
       मानस के  रचनाकार गोस्वामी जी ने बहुत ही सटीक उत्तर इसका दिया है गोस्वामी जी कहते हैं कि पाप का साथी कलयुग ने ज्ञान और वैराग्य आदि सभी सद्गुणों को अपना ग्रास बना लिया है । गीता रामायण और महाभारत आदि जितने भी हमारे सद्ग्रंथ थे वे सभी आज लुप्त होते जा रहे हैं । समाज में इनका अध्ययन अध्यापन लगभग बंद हो चुका है धर्म ग्रंथों का पठन-पाठन तो दूर की बात है ऊपर से लोग बेवजह इनकी निंदा करने लगे हैं । चारों ओर पाखंड का बोलबाला है ऐसे लोगों ने मनगढ़ंत अनेकों प्रकार के धर्म और संप्रदाय चला रखा है जिसका भक्ति के साथ कोई संबंध नहीं है ऐसे लोग ज्ञान भक्ति और वैराग्य से बिल्कुल अनजान हैं । हर जगह पाप का बोलबाला है जबकि सभी जानते हैं कि सुख और शांति का मूल भक्ति है 1

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

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