Pado kam samjho jyada

बुधवार, 6 जून 2018

वेदों का महत्व

वेद का अर्थ होता है ज्ञान अथवा जानकारी । इसकी उत्पत्ति संस्कृत के विद् धातु से हुई है ।वेद कोई साधारण पुस्तक नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का सबसे प्राचीनतम दस्तावेज है । यह किसी जाति धर्म या संप्रदाय से संबंधित नहीं है बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए अत्यंत ही उपयोगी और लाभदायक है । उसे और अधिक सरल भाषा में अगर कहें तो वेद मनुष्य जीवन का मूल संविधान है जिसके अभाव में मानव, मानव कहलाने का अधिकारी भी नहीं रह जाता । वेद के आधार पर ही दुनिया की अन्य धार्मिक मान्यताओं और विचारधाराओं का आरंभ और विकास हुआ है क्योंकि दुनिया का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद है जिसे ईश्वर की वाणी भी समझा जाता है । वेद का ज्ञान किसी जाति या संप्रदाय विशेष के लिए नहीं ,  बल्कि संपूर्ण प्राणी मात्र के लिए है । वेदों में ज्योतिष, गणित, विज्ञान, धर्म, औषधि, प्रकृति ,और खगोल के अलावा भी सभी विषयों का भंडार भरा पड़ा है। वेद मानवता की रीढ़ की हड्डी माने जाते हैं । इसके अभाव में सभ्यता की कल्पना भी नहीं की जा सकती । इतिहासकारों के अनुसार वेदों की रचना लगभग आज से 35०० वर्ष पूर्व माना जाता है । शुरुआत में केवल एक ही वेद ऋग्वेद था । अध्ययन में सरलता की दृष्टि से वेदव्यास जी ने उसे चार भागों में बांटा और अपने चार शिष्यों को पढ़ाया । ऋग्वेद , यजुर्वेद ,सामवेद ,  और अथर्ववेद ।
        वेदों के सार को समझने के लिए शिक्षा, (नाक )कल्प ,( हाथ ) व्याकरण , ( मुख )निरुक्त , ( कान )  छंद (  पैर )और ज्योतिष ( आंख ) इन वेदांगों के सहित ही वेद का अध्ययन परम आवश्यक है । वेद ना सिर्फ भारत का बल्कि विश्व का प्राचीनतम वांग्मय है । यह विश्व के सभी धर्मों का मूल है । इसका मतलब है संसार का कोई भी धर्म वेद से अलग नहीं है । इसीलिए कहा गया है ( वेदोsखिलो धर्म मूलम् ) वेद की समस्त शिक्षाएं सार्वभौम हैं ना कि किसी जाति या संप्रदाय विशेष के लिए । यह किसी भी इन्सान को हिंदू ,सिख ,इसाई ,बौद्ध ,जैन या मुसलमान बनने की आज्ञा नहीं देता बल्कि वेद का कहना है (मनुर्भव )अर्थात् मनुष्य बनो । फिर भी बहुत दुख की बात है कि आज के तथाकथित धर्म गुरु वेदों व अन्य धर्म शास्त्रों का कुप्रचार करने में ही अपनी विद्वता समझने लगे हैं । ऐसे धूर्त , देश द्रोही ,व बिकाऊ लोग मनुवाद व ब्राह्मणवाद आदि अनेकों वादों को चलाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं , देश में महान विवाद को जन्म देने में लगे हुए । हलाकि ये लोग वेद  ज्ञान से बिल्कुल सून्य होते हैैं कभी भी उन्होंने वेदों को पढ़ा लिखा नहीं है । वेदों का मौलिक ज्ञान नहीं होने से ही आज का इंसान जगह-जगह भटक रहा है । कभी इस कैंप में तो कभी उस कैंप में । आज जगह-जगह कैंप लगाकर  होलसेल में नाम दान दिया जा रहा है। इसी बहाने रामपाल , आसाराम , राधे मां ,निर्मल बाबा ,और राम रहीम जैसे पाखंडी संत बरसाती कीड़े मकोड़ों की तरह भर गए हैं और ये भोली भाली जनता को लूटने में लगे हुए हैं। इसका मूल कारण है ज्ञान का अभाव । ये राक्षस लोगों ने अपने आप को भगवान घोषित कर रखा है जबकि सभी जानते हैं कि भगवान ईश्वर या परमात्मा केवल एक है उसके नाम और रूप अनेक हो सकते हैं । वेद कहता है ( एकं सद्विप्रा बहुधा वदंति ) अर्थात् एक ही परमात्मा को विद्वान लोग अनेकों नामों से जानते हैं , अनेक रूपों में उसकी पूजा अर्चना करते हैं ।
      भगवान का स्वरूप कैसा है , इसे बताते हुए वेद कहता है कि विश्व के असंख्य प्राणियों के असंख्य सिर , आंखें और पैर उस परमपिता परमेश्वर का ही सिर , आखें तथा, पैर है । वह ईश्वर संपूर्ण ब्रहमांड को बाहर और भीतर सब ओर से घेर कर सर्वत्र व्याप्त है ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः .......... 

रविवार, 3 जून 2018

दुःखी जीवन कारण और निदान

आज का युग विज्ञान का युग है । शिक्षा का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है । अधिकतर लोग शिक्षित हो चुके हैं । आज बड़े बड़े डॉक्टर , वकील , लेखक , कथावाचक एवं ब्रह्म ज्ञानी लोग उत्पन्न हो चुके हैं ,  अनेकों प्रकार की दवाइयां बन चुकी है,  हर प्रकार के सुख साधन उपलब्ध हैं ,प्रतिदिन हजारों कथाएं हो रही है परंतु चिंता का विषय यह है कि इतना कुछ होने के बावजूद भी इंसान का जीवन बद से बदतर होता जा रहा है आखिर क्यों ? इस पर हमें गहराई से चिंतन करना होगा । इसका सही उत्तर है
कलिमल   ग्रसे   धर्म सब , लुप्त      भए   सदग्रंथ ।
 दंभिन्ह निज मति कल्पि करि, प्रकट किए बहु पंथ।।
 भ‌ए लोग सब मोहबस , लोभ     ग्रसे   शुभ  कर्म ।
सुनूं हरिजान ज्ञान निधि , कहउ   कछुक कली धर्म।।
बरन धर्म नहीं आश्रम चारी । श्रुति विरोध रत सब नर नारी ।।
       मानस के  रचनाकार गोस्वामी जी ने बहुत ही सटीक उत्तर इसका दिया है गोस्वामी जी कहते हैं कि पाप का साथी कलयुग ने ज्ञान और वैराग्य आदि सभी सद्गुणों को अपना ग्रास बना लिया है । गीता रामायण और महाभारत आदि जितने भी हमारे सद्ग्रंथ थे वे सभी आज लुप्त होते जा रहे हैं । समाज में इनका अध्ययन अध्यापन लगभग बंद हो चुका है धर्म ग्रंथों का पठन-पाठन तो दूर की बात है ऊपर से लोग बेवजह इनकी निंदा करने लगे हैं । चारों ओर पाखंड का बोलबाला है ऐसे लोगों ने मनगढ़ंत अनेकों प्रकार के धर्म और संप्रदाय चला रखा है जिसका भक्ति के साथ कोई संबंध नहीं है ऐसे लोग ज्ञान भक्ति और वैराग्य से बिल्कुल अनजान हैं । हर जगह पाप का बोलबाला है जबकि सभी जानते हैं कि सुख और शांति का मूल भक्ति है 1

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

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