जनम से सभी शूद्र होते हैं। कोई भी ब्राह्मण क्षत्री या वैश्य नहीं होता। उसके बाद संस्कार से द्विज वेदों के अध्ययन से विप्र और तपस्या या विद्या से ब्रम्ह की जानकारी हो जाने पर ब्यक्ति ब्राह्मण बनता है अर्थात जन्म से कोई ब्राह्मण या अन्य वर्ण नहीं होता बल्कि कर्म के अनुसार वर्ण बनता है राम चरित मानस में गोस्वामी जी ने लिखा है ----कर्म प्रधान विश्व रची राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा। कर्म के अनुसार ही पुरे संसार की रचना हुई है। इस लिए जो कोई भी जैसा कर्म करेगा उसी के अनुसार उसे फल भी मिलेगा। संसार में सबकुछ होने के बाबजूद भी सभी को सबकुछ नहीं मिलता बल्कि कर्म के अनुसार ही प्राप्ति होती है।अच्छे कर्म से ही ब्यक्ति महान बनता है और बुरे कर्मो से राक्षस।
मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017
बुधवार, 29 मार्च 2017
8 Sidhi
आठ प्रकार
की सिद्धियां
दोस्तों कहा जाता
है कि
हनुमान जी
महाराज आठ
प्रकार की
सिद्धियों और नौ प्रकार की
निधियों के
दाता हैं
। हनुमान
चालीसा में
आया है
अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता तो
सवाल है
कि वो
आठ सिद्धियां
और नौ
निधियां कौन-कौन सी
हैं अष्ट
सिद्धियां निम्न लिखित हैं -
1 अणिमा --अणिमा अर्थात्
छोटा ।
इस सिद्धि
के प्रभाव
से कोई
भी जीब
अपने आप
को छोटे
से छोटे
रूप में
परिवर्तित कर सकता है सूक्ष्म
रुप धारण
कर सकता
है ।
2 महिमा --इस सिद्धि
के प्रभाव
से कोई
भी प्राणी
बड़ा से
बड़ा रुप
धारण कर
सकता है
।
3 लघिमा -- इसके प्रभाव
से जीव
बहुत ही
हल्का बन
सकता है
अपने भार
को घटा
सकता है
।
4 गरिमा--गरिमा का
अर्थ भारी
होता है
तो इस
सिद्धी के
प्रभाव से
कोई भी
अपने शरीर
के भार
को मनचाहे
ढंग से
बढ़ा सकता
है ।
5 प्राप्ति --इस सिद्धि
के प्रभाव
से किसी
भी वस्तु
को प्राप्त
किया जा
सकता है
पशु-पक्षियों
की भाषा
को भी
समझा जा
सकता है
और भविष्य
काल की
घटनाओं को
भी देखा
जा सकता
है ।
6 प्राकाम्य -- इस सिद्धि
के प्रभाव
से पृथ्वी
की गहराइयों
में पाताल
तक जाया
जा सकता
है आसमान
में उड़ा
जा सकता
है और
पानी में
अथवा आग
में भी
सुरक्षित चला
जा सकता
है ।
7 ईषित्व -- इस
सिद्धि की
मदद से
दैवीय शक्तियां
प्राप्त होती
है ।
8 वशित्व -- इस सिद्धि
के प्रभाव
से इंसान
जितेंद्रीय हो सकता है मन
पर नियंत्रण
कर सकता
है किसी
भी जीव
जंतु को
अपने बस
में कर
सकता है
।
9 प्रकार की
निधियां
1 पद्म, 2 महापद्म 3 नील,
4 मुकुन्द, 5 नन्द, 6मकर, 7 कच्छप, 8 षंख,
9 खर्व ।
स्ंाग्रह कतर्।
- आचार्य सिया
राम षास्त्री
Manas ke moti
मानस के मोती
1 गुरु महाराज के चरणों की
धूली दृष्टि दोषों को मिटाने के लिए उतम
सूरमा है।
2 सत्संग के
बिना ज्ञान नहीं मिलता और
सत्संग परमात्मा की कृपा से
प्राप्त होता है।
3 कोई भी
जात छोटी या बडी नहीं होती कर्म बडा
होता है।
4 संसार के
सभी प्राणियों में परमात्मा का
बास है
इस लिए
सभी पूजा के योग्य हैं।
5 राम चरित मानस वेदों का
सार है।
6 भगवान् के
पषु पक्षि बान्दर और भालू आदि भक्त भी
वंदनीय हैं।
7 नाम सुमिरन करने से सभी
दुख मिट
जाते हैं।
8 गुरु के
ज्ञान के
विना भव
सागर पार
करना असंभव है।
9 निर्गुण और
सगुन अथवा निराकार और साकार में वही अंतर है जो अंतर पानी और वर्फ में है।
10 श्रद्धा से
आलस्य से
या बैर
भाव से
किया गया
सुमिरण भी
हर जगह
कल्याण ही
करता है।
11 होनी अति
बलवान् होती है इसे कोई
टाल नहीं सकता।
12 भगवान् के
भजन में
वाधा डालने वाली संपत्ति ; घर
मकान ; और
परिवार सभी
नष्ट हो
जाएं ।
13 माता-पिता और गुरु की
बात विना ही सोचे समज्ञे मान लेना चाहिए।
14 ग्ुारु की
बातों चर
भरोसा न
करने वाले कभी सुखी नहीं होते।
15 विधाता के
लेख को
कोई मिटा नहीं सकता।
16 विन बुलाए किसी के घर
जाने से
प्यार और
इज्जत दोनो नष्ट हो जाते हैं।
17 जब जब
धर्म में
कमीं आती
है और
पापियों का
बोल बाला बढ़ जाता है
तब भगवान् का अवतार होता है।
18 वही स्त्री पुत्रबती है जिसका पुत्र भगवान् का
भक्त हो
वरना बांज्ञ रहना उत्तम है।
19 जिस राजा के राज्य में
प्रजा दुखी हो वह राजा नरक का भागी होता है।
20 जैसे पानी के विना नदी
और प्राण के विना षरीर का कोई महत्व नहीं होता वैसे ही पति के
विना नारी का जीवन होता है।
21 अपने मित्र के दुख से
दुखी न
होने वाले ब्यक्ति को देखना भी पाप है।
22 मूर्ख नौकर; कंजूस राजा; चरित्र हीन औरत और
कपटी मित्र ये सभी दुख
ही देने वाले होते हैं।
25 बहुत सुख;
बहुत धन;
और बहुत बड़ा परिबार ये
सभी भक्ति में वाधक हैं।
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