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रविवार, 4 फ़रवरी 2024

सति मोह प्रसंग

 सती मोह प्रसंग

एक बार त्रेता युग में भोले बाबा माता सती के साथ अगस्त ऋषि के पास गए संपूर्ण जगत के स्वामी जानकर अगस्त मुनि ने उनका बहुत ही आदर सत्कार किया और शास्त्र विधि से उनका पूजन किया उसके बाद मुनि ने भगवान शंकर को संपूर्ण राम कथा सुनाई जिसे सुनकर भगवान शंकर को परम आनंद की प्राप्ति हुई फिर भोले बाबा ने मुनि को भक्ति का रहस्य विस्तार से बताया कि भक्ति क्या होती है कैसे की जाती है

      इस प्रकार भगवान का गुणगान करते हुए महादेव जी कुछ दिनों तक मुनि के पास रहने के बाद मुनी से वीदा लेकर कैलाश की ओर चल पड़े उन्ही दिनों भगवान ने दशरथ जी के घर में उनके पुत्र के रूप में राम अवतार ले चुके थे राम जी का बनवास हो चुका था और वे दंडक वन में विचरण कर रहे थे । भगवान शंकर बनवासी रूप का दर्शन करना चाह रहे थे परंतु वे अपने मन में विचार करते हैं कि प्रभु ने तो गुप्त रूप से अवतार लिया है और मेरे जान पहचान करने से यह सारा भेद खुल जाएगा और लीला में विघ्न उत्पन्न हो सकता है इसलिए भगवान शंकर के मन में बड़ी खलबली मच गई क्योंकि मन में गुप्त रहस्य खुलने का डर था और दर्शन के लिए आंखें तरस रही थी भगवान इसी दुविधा में फंसे थे परंतु सती जी इस रहस्य से अनजान थीं ।

     भक्त भगवान का दर्शन करना चाहे और भगवान दर्शन ना दें ऐसा कभी हो ही नहीं सकता अचानक घटना घटती है और सामने राम जी अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी के साथ दिखाई देते हैं उस वक्त भगवान साधारण बिरही मनुष्य के समान लीला कर रहे हैं अपनी पत्नी सीता जी के बिरह में व्याकुल और बेचैन होकर जंगल में भटक रहे हैं भोले बाबा इस रहस्य को खोलते हुए कहते हैं कि जिस भगवान के पास कभी भी योग या वियोग होता ही नहीं क्योंकि भगवान तो परमानंद है उनके दुख के विषय में सोचना भी पाप है आज लीला बस उसी भगवान को पत्नी वियोग में दुखी देख रहा हूं यही विचित्रता है क्या विचित्र लीला है भगवान की इसलिए गोस्वामी जी ने लिखा 

अती विचित्र रघुपति चरित्त जानहीं परम सुजान ।

जो मतिमंद विमोह बस, हृदय धारहिं कछु आन।। भगवान श्री राम का चरित्र बड़ा ही विचित्र है उसको पहुंचे हुए भक्त और ज्ञानी लोग ही समझ सकते हैं साधारण लोगों की समझ से परे की बात है और जो मंदबुद्धि हैं नास्तिक हैं वे अपनी अज्ञानता के कारण इस गुप्त लीला को कुछ और ही समझ बैठते हैं और अपनी बीमारी लोगों में फैलाते हुए कहते हैं कि राम भगवान नहीं है वह तो एक साधारण राजा है भक्तों भगवान के विषय में शंका करना या कुतर्क करना अति विनाशकारी होता है इसी बात को बताने के लिए सती जी के द्वारा कुतर्क करने की लीला आप आगे देखेंगे

        जब भगवान शिव ने श्री राम जी को दंडक वन में विलाप करते हुए देखा तो उन्हें दूर से ही

जय सच्चिदानंद जग पावन ।

अस कही चलेउ मनोज नासावन ।। 

हे संसार को पवित्र करने वाले सत् चित आनंद स्वरूप हे परमानंद सच्चिदानंद आपकी जय हो जय हो प्रभु । इस प्रकार सच्चिदानंद कहकर उन्हें दूर से ही प्रणाम किया लेकिन उनके पास नहीं गए ऐसा करने से पास जाकर जान पहचान करने से लीला में वाधा उत्पन्न हो सकती थी ।

      इस प्रकार अपने मन में विचार करते हुए भगवान शंकर माता सती जी के साथ कैलाश की ओर चले जा रहे हैं उनका शरीर आनंद से बार-बार पुलकित हो रहा है रोम रोम में रोमांच हो रहा है जब सती जी ने शिवजी की ऐसी दशा देखी तो उनके मन में बड़ा भारी संदेह उत्पन्न हो गया यहां मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि सती जी तो आदिशक्ति हैं जग जननी है सृष्टि स्थिति व विनाश के कारण है भगवान की अहलादिनी शक्ति है वही दुर्गा काली पार्वती व सीता हैं भला उन्हें भगवान के विषय में शंका कैसे हो सकती है वह तो साधारण स्त्रियों को ज्ञान देने के लिए लीला कर रही हैं इसीलिए इस प्रसंग के प्रारंभ में ही गोस्वामी जी ने बता दिया है कि सती जी जग जननी है माता पार्वती अर्थात भवानी है ।

संग सती जग जननि भवानी ।

पूजे ऋषि अखिलेश्वर जानी ।।

  पहले ही बताया जा चुका है कि भगवान की लीला बहुत ही विचित्र है उसे हर कोई नहीं समझ सकता इसी बात को सिद्ध करने के लिए सती जी यह लीला कर रही है ।

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