वर्ण व्यवस्था
वर्ण व्यवस्था समाज को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने का एक वैदिक विधान है जो कि व्यक्ति के स्व भाविक गुणों के आधार पर निर्धारित है । अर्थात व्यक्ति के अंदर जैसा स्वाभाविक गुण होता है उसी के अनुसार उसके वर्ण का निर्धारण होता है । संसार में जितने भी बुद्धिजीवी एवं उच्च शिक्षित लोग हैं उन सबको ब्राह्मण वर्ण में रखा गया है । शारीरिक एवं मानसिक रूप से अत्यंत बलवान व्यक्ति क्षत्रिय कहलाता है । आयात और निर्यात आदि व्यापार कर्म में निपुण लोगों को वैश्य वर्णन कहा जाता है । उपरोक्त तीनों गुणों से रहित और अशिक्षित मजदूरी करने वाले श्रमिकों को शुद्र वर्ण के अंदर रखा गया है । अर्थात संसार में जितने भी उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टर वकील इंजीनियर आईपीएस ऑफीसर्स आदि बुद्धिजीवी लोग हैं जिनकी बुद्धि की सहायता से देश को चलाया जाता है उन सबको ब्राह्मण कहा जाता है । चाहे उनका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो । सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने वाले सभी सत्ताधारी लोगों, पुलिस वालों एवं सुरक्षा कर्मचारियों को क्षत्रिय वर्णन के अंदर माना जाता है । और अशिक्षित मजदूरी करने वाले सभी लोग शुद्र कहलाते हैं । अतः शुद्र कोई जात नहीं है बल्कि श्रमिकों एवं अज्ञानी लोगों को ही शुद्र कहा जाता है । वर्ण व्यवस्था की यही परिभाषा श्रीमद् भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवत महापुराण आदि धर्म ग्रंथो में भी दी गई है ।
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